आज क्रिसमस का दिन था मैं इस बार देर से चर्च के लिए निकला लगभग रात के 8 बज चुके थे, मैं भी चर्च पहुंच कर सबों की तरह कर मोमबत्ती जलाया और यीशु से ढेर सारी मनोकामनाएं मांगा और बस वहां से निकलने हीं वाला था कि वहां पर तीन-चार बच्चे और और एक महिला थी जो बिलकुल ही फटे पुराने कपड़े पहने हुवे थे बस यू हीं बच्चे बुझे मोमबत्ती को वहां से लेने लगे शायद उनके घर में रोशनी की कमी थी....हम सभी ये देख कर दंग रह गए कुछ ने तो आवाज लगाई कि क्या कर रहे हो जाओ यहां से लेकिन ये उनकी मजबूरियां थी या कुछ और कहा भी नहीं जा सकता.... मैं बस वहां से निकलने ही वाला था लेकिन उनकी ये दशा नहीं देखी जा रही थी मेरे ख्यालों में उनकी मजबूरियां की छवि हीं चल रही थी मैंने उस महिला के पास जा कर उनसे बात करने की कोशिश की पर वे सिर्फ खाना की बात हीं कर रहे थे शायद लोगो से कुछ उम्मीद लगाए यहां आए थे तो मैंने अपने पैकेट में हाथ डाला पर कुछ ही पैसे थे शायद 40-50 रुपए लेकिन इतना से क्या होता फिर भी सोचने से क्या लाभ... मैंने दे दिए शायद कुछ मदद मिल जाए और वहां से निकलने से पहले यीशु से एक आखरी प्रार्थना की कि हे ईश्वर इनकी बस आप ही मदद कर सकते है इनकी इतना मदद कर देना ताकि इनको जीने के लिए दो वक्त का अन्न मिल सके ....बस निकलने ही वाला था कि वहीं रास्ते में वही बच्चे फिर मिले, मैंने उनसे बात करने की कोशिश कि उनके घर के बारे में लेकिन वे सिर्फ कुछ खाने के लिए कुछ पैसे मांग रहे थे छोड़ने को तैयार ही नहीं पर मेरे पास तो अब कुछ भी नही बचा,उनको जब मैंने बोला कि मैंने आपके मम्मी को कुछ पैसे दे दिए है जाके कुछ खा लेना तो तुरंत जवाब मिला कि वो मेरी मौसी है शायद उनकी मम्मी साथ नहीं आई थी या उनकी मां इस दुनिया में थी ही नहीं लेकिन मैं मन हीं मन सोच ही रहा था कि इतना चंद हीं रूपयो से क्या होने वाला है.... इतना कहते बाहर तक भी साथ ही आए शायद कुछ मिल जाए पर मैं कुछ भी नही दे सका इतने में हीं उनकी मोसी यान पड़ी और डाटने लगी और बोल रही थी कि चलो घर.... , मैंने कुछ दूर तक उनका पीछा किया तो मैं उन बच्चो के हाथों में एक बासुंरी और मोमबत्तियां थी, उनमें एक को जलाए हुए और बांसुरी बजाते अंधेरे सड़को पर जा रहे थे और बची हुई मोमबत्तियां जो शायद उनकी छोटी-सी हथेलियों में अट नही पा रहा था फिर भी दबोचे मानो ऐसा लग रहा था कि उनको घर के लिए रोशनी मिल गई हो और चलते गए चलते गए..., पर उनकी ये हुशमुख चेहरा साथ बांसुरी की बेधुन सुर मानो मन मोह रहा था,मुझे भी वापस घर को लौटना था काफ़ी रात होने को चली थी और ठंड भी काफ़ी थी तो मैंने उनकी चेहरे की खुशी की यादों को समेटे अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।
Written by:- kr Karan
(25/12/2021)