शहर की भीड़ से दूर चलते है
चलो अपनों के पास गांव चलते है।
चलो उन हसीन लम्हों को याद करते है
वही मस्त बचपन की ओर लौटते है।
मां के उन लोरियों को याद करते है
दादी-नानी के परियों की कहानियों में लौटते है।
चलो वही सुनसान पड़ी गलियों में जाते है
जहां यारों संग गुल्ली-डंडे-कंचे खेला करते थे।
चलो मिलकर पत्थर उछालते है
शाखाओं से कुछ आम तोड़ते है।
चलो मिट्टी के खिलौने बनाते है
बेझिझक मिट्टी में लोट पोट होते है।
चलो बेफिक्र जिंदगी जीते है
चलो मस्त बचपन की ओर लौटते है।