आज बहुत दिनों बाद जब किसी काम से मुझे अपना कॉलेज संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग
जाना
हुआ , कुछ जगहें केवल ईंट‑पत्थर की बनी इमारतें नहीं होतीं, वे हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने वाली पाठशालाएँ होती हैं। संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग मेरे लिए ऐसी ही एक जगह है, जहाँ की हर याद आज भी मन के किसी कोने में जीवित है अभी भी कॉलेज की दीवारों से वही रौनक और झलक नजर आ रही थी , सिर्फ बदला था तो सिर्फ समय, खैर... मैं अब मुद्दे पर आता हूं बताने पर आए तो पूरा रात कम पड़ सकती है...।
महाविद्यालय परिसर में आज मेरी मुलाकात कॉलेज के माननीय पूर्व प्राचार्य डॉ सुशील टोपो से हुई जो उन दिनों हमारे कॉलेज के प्राचार्य हुआ करते थे , आज उनसे अचानक ऐसे मुलाक़ात, ये मेरी किस्मत थी या संयोग ये मैं नहीं कह सकता, जाकर मैंने चरण स्पर्श किए, और बहुत उत्सुकता से मैंने बातें की हालांकि आज भी उन दिनों जैसा हल्का डर था लेकिन उनके स्वभाव ने मुझे वो पुरानी डर व झिझक भुला दिए थे और सर भी वहीं पुराने स्वभाव में बातें किए , लेकिन आज एक चीज अलग थी सर के चेहरे पर मुस्कुराहट भरी अंदाज से बाते करना, सर ने मेरे हालचाल और शैक्षणिक स्थिति के बारे में पूछा ,चुकी मैं भी वर्तमान में एक शिक्षक के तौर पर शिक्षण का कार्य कर रहा था तो एक शिक्षक का उनके बच्चों से क्या उम्मीदें होती है थोड़ा बहुत मुझे भी इसका अनुभव होते जा रहा है, तो मैंने भी सब कुछ बताया जैसे कि वर्तमान मेरा शैक्षणिक स्थिति, शिक्षण कार्य में संलिप्तता, और हाल हीं में मैंने SSC मैंस की परीक्षा दी है, परिणाम आने बाकी है... और भी बहुत कुछ... और आज कुछ कागजात संबंधित कार्य से कॉलेज आए है... खैर सर का स्वभाव आज कुछ अलग था, सुनकर बहुत खुश हुए और निरंतर ईमानदारी से मेहनत करते रहना और ऊर्जावान भरी प्रेरक उपदेश दिए और बातों-बातों में... और बस क्या था सर को कहीं जरूरी काम से निकलना था सर ने एक अलविदा भरी मुस्कान समाए आगे की ओर बढ़ने की ओर अग्रसित हुवे , हमने भी सर को पुनः चरण स्पर्श किया और... सर आशीर्वाद देते हुए आगे की ओर बढ़ गए , हालांकि मिलने से पहले वही कॉलेज वाली हल्की डर अभी भी कायम था, लेकिन मिलने के बाद बहुत अच्छा लगा और सब कुछ पहले से बिल्कुल अलग था... , बाद में कॉलेज से पता चला कि आज कॉलेज में दो स्टाफ का सेवानिवृत्ति थी शायद सर उसी काम से आज कॉलेज आए थे। इसी मुलाकात से भीनी कुछ यादें है जो मुझे आज भी याद है...
बात उन दिनों की है जब मैं यहां अध्ययनरत था और उन दिनों अक्सर कॉलेज में किसी परीक्षा सेंटर के वजह से हमारी कक्षा 7:00 am से चलती थी, ठंड का भी मौसम था, उस दिन मेरा साइकिल भी खराब के वजह से पैदल ही जाना पड़ा, मैं गेट पर 7:01 या 7:02 मिनट पर पहुंचा था, समय मुझे इसीलिए भी कंठस्थ है चुकी जिस गेट से हमें प्रवेश होती थी वही ऊपर एक बड़ी सी घड़ी लगी थी, मुख्य गेट पर सर गेट पर खड़े थे जो उन दिनों अक्सर कॉलेज अहले सुबह साइकिल से आ जाते थे, हम भी आश्चर्यचकित थे कि इतने बड़े व्यक्तित्व और अहले सुबह 24 इंच वाली साइकिल चलाकर खुद आ जाते है खैर.. उनका व्यक्तित ऐसे हीं बेमिसाल नहीं था, हमलोगों के इतनी सी देरी के वजह से प्रवेश से रोक दिए रोक दिए, हम लगभग 20-30 छात्र होंगे, विनती करने के बाद भी नहीं जाने दिए, कि 1 मिनट हीं देर हुई.... खैर.. कोई दाल न गली और ऊपर से डांट...
प्राचार्य जी ने डांटते हुए कहे —
“एक मिनट की देरी आज छोटी लग सकती है, लेकिन यही आदत, कल बड़ी कीमत वसूलती है..., तुमलोगो का रोज रोज का आदत सी हो गई है, जाओ यहां से वापस... और भी बहुत कुछ... हम सभी सिर झुकाए सुन रहे थे, भला क्या ही कर सकते थे, गलती हम सब की हीं थी...
हम सभी उस पीरियड चलने तक बाहर ही घूमते रहे, और जब पीरियड बदला और सर को गेट पर न होने के वजह दूसरी पीरियड में प्रवेश कर उस दिन का कक्षा तो कर लिए लेकिन उस दिन का अटेंडेंस नहीं बन सका, खैर उस दिन के लिए उदास भरी थी लेकिन जीवन में 1 मिनट के महत्ता को समझाया और आज समझ आता है कि वह एक मिनट की देरी, सिर्फ देरी नहीं थी, बल्कि समय, अनुशासन और जीवन में समयबद्धता के प्रति सचेतना के अमूल्य पाठ को सीखा गया। उनकी यह बात मेरे मन में घर कर गई। उस समय शायद मुझे पूरी तरह समझ नहीं आया, लेकिन धीरे‑धीरे जीवन के हर मोड़ पर उस एक मिनट का अर्थ स्पष्ट होता चला गया। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि वह घटना सज़ा नहीं थी, बल्कि अनुशासन का उपहार थी। उस एक मिनट ने मुझे समय का सम्मान करना सिखाया, जिम्मेदारी का अर्थ समझाया और जीवन को गंभीरता से लेना सिखाया। संत कोलम्बा महाविद्यालय केवल मेरी शिक्षा का स्थान नहीं रहा, बल्कि मेरे चरित्र निर्माण की भूमि बना। यहाँ की हर सीख, हर अनुभव आज भी मेरे साथ है। वास्तव में, वह एक मिनट की देरी नहीं थी—
वह जीवन को सही दिशा में मोड़ देने वाला एक अमूल्य क्षण था जो यह हमें जीवन भर याद आते रहेगी, कुछ ऐसी थी सर का अनुशासन और मेरा कॉलेज का अनुशासन।
सर के साथ कुछ स्मरणीय यादगार पल के साक्ष्य।