Monday, March 23, 2026

महज 23 के बाली उमर में

               महज 23 के बाली उमर में

वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में,
सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौफ था कोई नज़र में।
मगर अफ़सोस! आज़ाद हवाओं के उस दौर में उसे क्या सिला मिला?
अपनों के ही दस्तूरों में, उसे आज भी 'आतंकवादी' का रुतबा मिला।
इधर कुछ लोग 'अहिंसा' की ओट में, सियासत की मलाई चाटते रहे,
अय्याशियों में बीतीं रातें जिनकी, वो मुल्क का नक्शा बांटते रहे।
वो 'कुर्सी' के हकदार बने, जो महलों में आराम फरमाते थे,
और वो 'बागी' कहलाया, जिसके नाम से गोरे थर-थर कांपते थे।
अजीब दस्तूर है इस दौर-ए-आज़ादी का, यहाँ न्याय भी शर्मिंदा है,
शहीद फाइलों में 'मुजरिम' है, और 'अय्याश' यहाँ का बाशिंदा है।
जिन्होंने लहू से सींचा चमन, उन्हें कानून ने 'दहशतगर्द' करार दिया,
और जो समझौता कर बैठे तख़्त से, उन्हें इतिहास ने 'परवरदिगार' किया।

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"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है"

Sunday, February 1, 2026

वो एक मिनट की देरी


                    वो एक मिनट की देरी

आज बहुत दिनों बाद जब किसी काम से मुझे अपना कॉलेज संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग जाना
हुआ , कुछ जगहें केवल ईंट‑पत्थर की बनी इमारतें नहीं होतीं, वे हमारे व्यक्तित्व को गढ़ने वाली पाठशालाएँ होती हैं। संत कोलम्बा महाविद्यालय, हजारीबाग मेरे लिए ऐसी ही एक जगह है, जहाँ की हर याद आज भी मन के किसी कोने में जीवित है अभी भी कॉलेज की दीवारों से वही रौनक और झलक नजर आ रही थी , सिर्फ बदला था तो सिर्फ समय, खैर... मैं अब मुद्दे पर आता हूं बताने पर आए तो पूरा रात कम पड़ सकती है...।

महाविद्यालय परिसर में आज मेरी मुलाकात कॉलेज के माननीय पूर्व प्राचार्य डॉ सुशील टोपो से हुई जो उन दिनों हमारे कॉलेज के प्राचार्य हुआ करते थे , आज उनसे अचानक ऐसे मुलाक़ात, ये मेरी किस्मत थी या संयोग ये मैं नहीं कह सकता, जाकर मैंने चरण स्पर्श किए, और बहुत उत्सुकता से मैंने बातें की हालांकि आज भी उन दिनों जैसा हल्का डर था लेकिन उनके स्वभाव ने मुझे वो पुरानी डर व झिझक भुला दिए थे और सर भी वहीं पुराने स्वभाव में बातें किए , लेकिन आज एक चीज अलग थी सर के चेहरे पर मुस्कुराहट भरी अंदाज से बाते करना, सर ने मेरे हालचाल और शैक्षणिक स्थिति के बारे में पूछा ,चुकी मैं भी वर्तमान में एक शिक्षक के तौर पर शिक्षण का कार्य कर रहा था तो एक शिक्षक का उनके बच्चों से क्या उम्मीदें होती है थोड़ा बहुत मुझे भी इसका अनुभव होते जा रहा है, तो मैंने भी सब कुछ बताया जैसे कि वर्तमान मेरा शैक्षणिक स्थिति, शिक्षण कार्य में संलिप्तता, और हाल हीं में मैंने SSC मैंस की परीक्षा दी है, परिणाम आने बाकी है... और भी बहुत कुछ... और आज कुछ कागजात संबंधित कार्य से कॉलेज आए है... खैर सर का स्वभाव आज कुछ अलग था, सुनकर बहुत खुश हुए और निरंतर ईमानदारी से मेहनत करते रहना और ऊर्जावान भरी प्रेरक उपदेश दिए और बातों-बातों में... और बस क्या था सर को कहीं जरूरी काम से निकलना था सर ने एक अलविदा भरी मुस्कान समाए आगे की ओर बढ़ने की ओर अग्रसित हुवे , हमने भी सर को पुनः चरण स्पर्श किया और... सर आशीर्वाद देते हुए आगे की ओर बढ़ गए , हालांकि मिलने से पहले वही कॉलेज वाली हल्की डर अभी भी कायम था, लेकिन मिलने के बाद बहुत अच्छा लगा और सब कुछ पहले से बिल्कुल अलग था... , बाद में कॉलेज से पता चला कि आज कॉलेज में दो स्टाफ का सेवानिवृत्ति थी शायद सर उसी काम से आज कॉलेज आए थे। इसी मुलाकात से भीनी कुछ यादें है जो मुझे आज भी याद है...

बात उन दिनों की है जब मैं यहां अध्ययनरत था और उन दिनों अक्सर कॉलेज में किसी परीक्षा सेंटर के वजह से हमारी कक्षा 7:00 am से चलती थी, ठंड का भी मौसम था, उस दिन मेरा साइकिल भी खराब के वजह से पैदल ही जाना पड़ा, मैं गेट पर 7:01 या 7:02 मिनट पर पहुंचा था, समय मुझे इसीलिए भी कंठस्थ है चुकी जिस गेट से हमें प्रवेश होती थी वही ऊपर एक बड़ी सी घड़ी लगी थी, मुख्य गेट पर सर गेट पर खड़े थे जो उन दिनों अक्सर कॉलेज अहले सुबह साइकिल से आ जाते थे, हम भी आश्चर्यचकित थे कि इतने बड़े व्यक्तित्व और अहले सुबह 24 इंच वाली साइकिल चलाकर खुद आ जाते है खैर.. उनका व्यक्तित ऐसे हीं बेमिसाल नहीं था, हमलोगों के इतनी सी देरी के वजह से प्रवेश से रोक दिए रोक दिए, हम लगभग 20-30 छात्र होंगे, विनती करने के बाद भी नहीं जाने दिए, कि 1 मिनट हीं देर हुई.... खैर.. कोई दाल न गली और ऊपर से डांट...
प्राचार्य जी ने डांटते हुए कहे —
“एक मिनट की देरी आज छोटी लग सकती है, लेकिन यही आदत, कल बड़ी कीमत वसूलती है..., तुमलोगो का रोज रोज का आदत सी हो गई है, जाओ यहां से वापस... और भी बहुत कुछ... हम सभी सिर झुकाए सुन रहे थे, भला क्या ही कर सकते थे, गलती हम सब की हीं थी...
हम सभी उस पीरियड चलने तक बाहर ही घूमते रहे, और जब पीरियड बदला और सर को गेट पर न होने के वजह दूसरी पीरियड में प्रवेश कर उस दिन का कक्षा तो कर लिए लेकिन उस दिन का अटेंडेंस नहीं बन सका, खैर उस दिन के लिए उदास भरी थी लेकिन जीवन में 1 मिनट के महत्ता को समझाया और आज समझ आता है कि वह एक मिनट की देरी, सिर्फ देरी नहीं थी, बल्कि समय, अनुशासन और जीवन में समयबद्धता के प्रति सचेतना के अमूल्य पाठ को सीखा गया। उनकी यह बात मेरे मन में घर कर गई। उस समय शायद मुझे पूरी तरह समझ नहीं आया, लेकिन धीरे‑धीरे जीवन के हर मोड़ पर उस एक मिनट का अर्थ स्पष्ट होता चला गया। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो समझ आता है कि वह घटना सज़ा नहीं थी, बल्कि अनुशासन का उपहार थी। उस एक मिनट ने मुझे समय का सम्मान करना सिखाया, जिम्मेदारी का अर्थ समझाया और जीवन को गंभीरता से लेना सिखाया। संत कोलम्बा महाविद्यालय केवल मेरी शिक्षा का स्थान नहीं रहा, बल्कि मेरे चरित्र निर्माण की भूमि बना। यहाँ की हर सीख, हर अनुभव आज भी मेरे साथ है। वास्तव में, वह एक मिनट की देरी नहीं थी— वह जीवन को सही दिशा में मोड़ देने वाला एक अमूल्य क्षण था जो यह हमें जीवन भर याद आते रहेगी, कुछ ऐसी थी सर का अनुशासन और मेरा कॉलेज का अनुशासन।


सर के साथ कुछ स्मरणीय यादगार पल के साक्ष्य।

Saturday, January 10, 2026

खिड़की से झांकती हिंदी

            "खिड़की से झांकती हिंदी"

वो जो माथे की बिंदी थी, अब धीरे से सरक रही है
अपनी ही घर की चौखट पर, हिंदी आज सिसक रही है
सूट-बूट की इस दुनिया में, वो धोती-कुर्ता हार गया
अंग्रेजी के एक 'Hello' ने, 'नमस्ते' को मार दिया।

मैं कक्षा में जब 'हृदय' कहूं, तो बच्चे 'Heart' समझते हैं,
मैं 'अंबर' की बात करूं, तो 'Sky' का पाठ समझते हैं
गिनती अब 'वन-टू' में है, उनसठ,उन्न्नतर में उलझन है
अपनी देश की भाषा बोलने में, कैसी ये अड़चन है?

वो प्रेमचंद की गोदान कहाँ,वो मीर-ग़ालिब की बात कहाँ
वो माँ की लोरी वाली रातों की, अब वो सौगात कहाँ
हमने शब्दों को बेच दिया, अब बस इमोजी के आदी हैं
हम अपनी विरासत भूल चुके, हम कैसे ये स्वदेशी हैं?

हिंदी कोई बोझ नहीं, ये तो बहती गंगा है
मर्यादा की ये भाषा है, संस्कृति का ये गहना है
मत भूलो अपनी विरासत को, ये दुनिया को बतलाना है
हिंदी दिवस बस एक दिन नहीं, इसे हर दिन अपनाना है।

बिना जड़ के ये पेड़ कभी, फल दे नहीं पाएगा,
जो अपनी भाषा भूल गया, वो जग में खो जाएगा
मिट्टी से नाता तोड़ोगे, तो वजूद कहाँ से लाओगे
निज भाषा गर खो गई, तो स्वाभिमान कहाँ से लाओगे?

Saturday, March 29, 2025

अपना नव वर्ष भूले हम

             अपना नव वर्ष भूले हम

चैत्र शुक्ल की भोर आई, पर कोई उल्लास नहीं
धूप सुनहरी खिली मगर, हर्ष-उमंग का आभास नहीं।

घरों में दीप ना जले कहीं, ना मंगल गीत बजे
पर दिसंबर की रात को देखो, शराब के जाम सजे।

संवत्सर की बात न पूछो, अब कैलेंडर ही सत्य हुआ
अपना गौरव छोड़ विदेशी, नव वर्ष का भक्त हुआ।

बूढ़े दादा टकटकी लगाए, पोते से कुछ आस लिए
पर वो मस्त जश्न में डूबा, वेस्टर्न रंग लपेट लिए।

संस्कृति की ये हार क्यों, हम खुद इसे मिटा रहे
स्वयं के घर को छोड़कर, पराई छत पर जा रहे।

विक्रम संवत, हिन्दू नूतन वर्ष २०८२ व चैत्र नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं

Saturday, June 24, 2023

सपनों में रख विश्वास तू

                   सपनों में रख विश्वास तू

ना हार तू , ना डर तू
बस सपनों में रख विश्वास तू
कर्म त्याग और समर्पण से ना डर तू
बस आलस परित्याग किए जा तू।

अनजाने में हुई चूक से ना घबरा तू
बस याद रख गिरकर भी खड़ा हो जा तू
समस्याओं को रास्तों से निकाल फेंक
चट्टान भी आये रास्तों में तो उछाल फेंक।

कोशिश जारी रख कुछ कर गुजरने की
और रख हिम्मत तूफानों से टकराने की
जो पाना है बस उसकी पागलों-सी चाहत रख
करता रह कर्म और साथ रख विश्वास तू।

ताकत जुटा और हिम्मत को आग दे
कोशिश कर हल निकलेगा आज नहीं तो कल निकलेगा
फिर देख तू किस्मत क्या रंग दिखलाएगी
और तुझको तेरी मंजिल मिल जायेगी।

Saturday, May 20, 2023

Childhood Memories

                  Childhood Memories 

Those were beautiful days
Only food, fun and play
Tension free all the ways
In the night, while feeding me
My mother used to tell me stories
I don't remember but she says

There were no sorrow, nor grief
Earlier we slept on mother's lap
In friendship, neither deceit nor gap
When we used to play cop and thief
There were no thoughts of profit and loss
Oh! How beautiful those days!

There were wonderful days
Neither fear of exam, nor any stress
Fighting with siblings and crocodile tears were usual
But bonding of love was stronger and deeper
If realising those moments, enough to bring smile
Oh! How beautiful those reminisces!

Tuesday, May 16, 2023

कर्मभूमि कर्मठ जन की

                  कर्मभूमि कर्मठ जन की 

एक नया भारत बनाने की मन में हमने ठानी है
जहाँ सतत् विकास हो और घर-संसार खुशहाल हो
जाति धर्म भेद मिटाकर अखंड भारत का निर्माण हो
विकसित भारत का दुनियां में अपनी एक पहचान हो।

जो कभी झुके नहीं, मंजिल से पहले रुके नहीं
हासिल होंगे हर मुकाम और पूरे होंगे अरमान
भुला ना सकेगा देश उन वीरों के बलिदान को
तोड़ गुलामी की बेड़ियां बनायी जिसने यह पहचान।

नफ़रत की दीवार तोड़कर प्रेम की गंगा बहाएंगे
सबको दिलों में फिर से, एकता का दीप जलाएंगे
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सबने एकता दिखाई है
तिरंगा हमारी शान है राष्ट्रीय गीत पहचान है।

जिस धरती पर जन्म लिया वह धरती सबकी माता है
कर्मभूमि कर्मठ जन की अपना धर्म निभाना है
नागरिकों में कर्तव्य भावना देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है
खुशहाल वतन और समाज को एक नया दिशा दे जाती है। 


महज 23 के बाली उमर में

                महज 23 के बाली उमर में वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में, सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौ...