Saturday, January 10, 2026

खिड़की से झांकती हिंदी

            "खिड़की से झांकती हिंदी"

वो जो माथे की बिंदी थी, अब धीरे से सरक रही है
अपनी ही घर की चौखट पर, हिंदी आज सिसक रही है
सूट-बूट की इस दुनिया में, वो धोती-कुर्ता हार गया
अंग्रेजी के एक 'Hello' ने, 'नमस्ते' को मार दिया।

मैं कक्षा में जब 'हृदय' कहूं, तो बच्चे 'Heart' समझते हैं,
मैं 'अंबर' की बात करूं, तो 'Sky' का पाठ समझते हैं
गिनती अब 'वन-टू' में है, उनसठ,उन्न्नतर में उलझन है
अपनी देश की भाषा बोलने में, कैसी ये अड़चन है?

वो प्रेमचंद की गोदान कहाँ,वो मीर-ग़ालिब की बात कहाँ
वो माँ की लोरी वाली रातों की, अब वो सौगात कहाँ
हमने शब्दों को बेच दिया, अब बस इमोजी के आदी हैं
हम अपनी विरासत भूल चुके, हम कैसे ये स्वदेशी हैं?

हिंदी कोई बोझ नहीं, ये तो बहती गंगा है
मर्यादा की ये भाषा है, संस्कृति का ये गहना है
मत भूलो अपनी विरासत को, ये दुनिया को बतलाना है
हिंदी दिवस बस एक दिन नहीं, इसे हर दिन अपनाना है।

बिना जड़ के ये पेड़ कभी, फल दे नहीं पाएगा,
जो अपनी भाषा भूल गया, वो जग में खो जाएगा
मिट्टी से नाता तोड़ोगे, तो वजूद कहाँ से लाओगे
निज भाषा गर खो गई, तो स्वाभिमान कहाँ से लाओगे?

महज 23 के बाली उमर में

                महज 23 के बाली उमर में वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में, सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौ...