Monday, March 23, 2026

महज 23 के बाली उमर में

               महज 23 के बाली उमर में

वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में,
सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौफ था कोई नज़र में।
मगर अफ़सोस! आज़ाद हवाओं के उस दौर में उसे क्या सिला मिला?
अपनों के ही दस्तूरों में, उसे आज भी 'आतंकवादी' का रुतबा मिला।
इधर कुछ लोग 'अहिंसा' की ओट में, सियासत की मलाई चाटते रहे,
अय्याशियों में बीतीं रातें जिनकी, वो मुल्क का नक्शा बांटते रहे।
वो 'कुर्सी' के हकदार बने, जो महलों में आराम फरमाते थे,
और वो 'बागी' कहलाया, जिसके नाम से गोरे थर-थर कांपते थे।
अजीब दस्तूर है इस दौर-ए-आज़ादी का, यहाँ न्याय भी शर्मिंदा है,
शहीद फाइलों में 'मुजरिम' है, और 'अय्याश' यहाँ का बाशिंदा है।
जिन्होंने लहू से सींचा चमन, उन्हें कानून ने 'दहशतगर्द' करार दिया,
और जो समझौता कर बैठे तख़्त से, उन्हें इतिहास ने 'परवरदिगार' किया।

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"सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है"

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