Saturday, March 29, 2025

अपना नव वर्ष भूले हम

             अपना नव वर्ष भूले हम

चैत्र शुक्ल की भोर आई, पर कोई उल्लास नहीं
धूप सुनहरी खिली मगर, हर्ष-उमंग का आभास नहीं।

घरों में दीप ना जले कहीं, ना मंगल गीत बजे
पर दिसंबर की रात को देखो, शराब के जाम सजे।

संवत्सर की बात न पूछो, अब कैलेंडर ही सत्य हुआ
अपना गौरव छोड़ विदेशी, नव वर्ष का भक्त हुआ।

बूढ़े दादा टकटकी लगाए, पोते से कुछ आस लिए
पर वो मस्त जश्न में डूबा, वेस्टर्न रंग लपेट लिए।

संस्कृति की ये हार क्यों, हम खुद इसे मिटा रहे
स्वयं के घर को छोड़कर, पराई छत पर जा रहे।

विक्रम संवत, हिन्दू नूतन वर्ष २०८२ व चैत्र नवरात्र की ढेर सारी शुभकामनाएं

महज 23 के बाली उमर में

                महज 23 के बाली उमर में वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में, सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौ...