Wednesday, June 15, 2022

😍खूबसूरत अंधेरा👁️😞

एक बार कि बात है,जब मैं बस से अपने घर से शहर की ओर जा रहा था, वही सफर के बीच में प्रकृति का मनोरम दृश्य से चाह के भी आंखे ओझल नहीं होती है। इसी को निहारते हुवे मैं अपने गंतव्य की और जा रहा था।
इसी बीच मेरी नज़र एकाएक एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी, जो दिखने में बहुत हीं खूबसूरत थी, उसमे से उसकी आंखे की खूबसूरती की बात हीं कुछ और थी, क्या आंखे थी..., शीशे जैसी चमचमाते बिलकुल पारियों सी। लेकिन क्या था, उसकी नज़रें एकदम सीधी सिर्फ आगे हीं देख रही थी। मुझे आश्चर्य हुवा की इतनी खूबसूरत प्रकृति की नजारे की ओर बाहर की ओर क्यों नहीं देख रही है, लग रहा था कि वह अपने बचपना वाले ख्यालों में खोई हुई है, शायद कुछ बातें होगी....या शायद मन नहीं होगा।
मैंने कुछ समय पश्चात फिर से देखा तो, मुझे फिर से आश्चर्य हुवा कि उसकी नज़रें सिर्फ आगे की ओर हीं थी।इस बार मुझसे रहा नही गया, मैंने बूढ़े लोगों के भांति उससे बहुत हीं विनर्मता से पेश आते हुए कहा-
प्यारी नन्ही सी परी... तुम बहुत हीं खूबसूरत हो.. और तुम्हारी आंखे परियों जैसे बहुत हीं ज्यादा खूबसूरत है, और तुम्हारी आंखों के काजल और भी अच्छे लग रहे है।
फिर क्या था, बहुत ही मीठी आवाज में जवाब आया-
"सर.., मुझे दिखाई नहीं देता है, मैं अंधी हूं...।"
ये सब बोलते वक्त उसकी जुबान लड़खड़ाई भी नहीं और ना हीं कोई संकोच व्यक्त की....।
पर, जैसे हीं उसकी मधुर आवाज मेरे कानों में दस्तक दी, मुझे बहुत हीं ज्यादा दुःख हुवा, मानो मेरा दिल कांप गया हो, और मेरे आंखो से आंसू निकल पड़े...।
फिर उसकी मां ने बताया कि वह कैसे अंधी हो गई थी।
उसकी मां बताती है कि बचपन का समय था जब उसकी बेटी छोटी थी, उसे पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उसे अन्य कलाबाजी में भी बहुत हीं रुचि थी जैसे- कढ़ाई, सिलाई-बुनाई, पेपर व कपड़ो को काट काट कर खूबसूरत खिलौने व अन्य वस्तुएं बनाना और खेल खुद।
ऐसे हीं दिनभर कलाबाजी करती रहती, दिन खुशियों से बितते जा रहे थे।
एक दिन की बात थी वह दिन बिल्कुल हीं साफ़ और सुहाने थे, सूरज दोपहर में चमक रहा था मैंने देखा कि वह अपना कढ़ाई का काम छोड़कर, अपने बगल में सूई को रख दी थी। मैंने दूसरे के भांति उसे डांटा और बोली- 'अपना काम को आधे-अधूरे क्यों छोड़ दी....'
तो, उसने जवाब दिया- 
"मम्मा... दिन ढल गया है, सूरज डूब चुका है, रात हो चुकी है...अब शेष कार्य मैं कल दिन में करूंगी...."
लेकिन जब ये सब बोल रही थी उस समय दोपहर में सूरज ठीक ऊपर चमक रहा था....शायद उसकी आंखो में सूरज के किरण प्रवेश नहीं कर पा रहे थे।
उसके मां से ये सब सुनकर मैं निशब्द हो गया और मेरे दिल के पीड़ा और भी बढ़ गया और मैंने अपने यात्रा के दौरान सिर्फ और सिर्फ उसी बच्ची के बारे में सोचता रहा.., सोचता रहा..., सोचता रहा.....!

महज 23 के बाली उमर में

                महज 23 के बाली उमर में वो चढ़ गया फांसी हँसते-हँसते, महज़ तेईस की बाली उमर में, सब कुछ लुटा दिया वतन पे उसने, न खौ...