Saturday, March 12, 2022

मेरी जिम्मेवारियां हीं, मुझे खुद दफ्न करते जा रही है..

यह कहानी उन लाखों लड़कों में से किसी एक की दास्तां है जो अपनी परिवार की जिम्मेवारियां सर पर उठाए बड़े शहरों में अपना परिवार की जरूरतों तथा अपनी सपनों को पूरा करने के लिए न जाने उन्हें कितने तकलीफे, पीड़ा और ठोकरें खाने को मिलते है, फिर भी वे अपनी जिम्मेवारियों से पीछे नही हटते....
 हरी नाम का एक लड़का(जिसके पिताजी पिछले गत कुछ सालों से गंभीर बीमारी से ग्रसित थे, यूं माने तो घर के एक कोने में सिर्फ एक लाश की तरह पड़े रहते थे) बड़े शहर बम्बई(मुंबई) जाता है, जाने के क्रम में उसने अपने जीवन में पहली बार रेलवे स्टेशन और लंबी-लंबी बोगियों वाली ट्रेन देखा, जहां लोग रात में लाशों की तरह जमीन पर पड़े कोई फटे कंबल में, तो कोई फटे शॉल में अपनी रातें बीता रहे थे और ट्रेन आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, इतना हीं में उसका बम्बई जाने वाला ट्रेन आती है जो पहले से हीं खचाखच भरी थी,उसने जैसे-तैसे, आनन-फानन में अपने लोगों के साथ ट्रेन में तो आ जाता है, लेकिन उसका पुरानी चप्पल जो घिस चुका था, लेकिन अभी भी चलता, गेट पर चढ़ने के दौरान भिड़ के अफरा-तफ़री के कारण एक चप्पल टूट कर वहीं रह गया, खैर उसे बम्बई जाना था तो उसने इसका परवाह नही किया, वैसे भी वह कर क्या सकता था सिवाय पछताने के। रास्ते में मां के हाथों से बने सूखे रोटियां और आचार तथा फूले चने खाकर बड़े हीं मुस्किल से रात-दिन बीता कर सपनों की दुनियां बम्बई पहुंच तो गया, पर वहां के जिंदगी देख दंग रह गया।
खैर... वहां उसे काम की तलाश में एक होटल के पास ले जाया जाता है जहां, गरीब भोजनालय जैसा घटिया होटल हरि ने कहीं नहीं देखा था । यहाँ तक कि उसके गाँव रामपुर में जो चाय के छोटे- मोटे होटल थे, वे भी उससे कई गुना अच्छी हालात में थे । लेकिन इसकी क्या बात करें । यहाँ की दीवाल पर तो एक ढंग की रंगीन तस्वीर भी नहीं लगी थी । हो सकता है कभी दीवार पर यहाँ कोई फोटो कभी लगी हो जो दीवार पर  जमी मैल और कालिख के नीचे गुम हो गयी हो । यहां तक कि कमरे या हॉल के छत की सीलिंग ( अंदरुनी छत ) पर मकड़े के जाले भरे पड़े थे , जिनमें कालिख और मैल जम गयी थी जो कभी भी किसी ग्राहक के सिर पर काली टोपी की तरह गिर पड़ती थी । प्लास्टिक और लकड़ी के टेबल भी काली मैल के चकत्तों से भरे पड़े थे। सारी रात और सारा दिन वहाँ चूल्हा जलता रहता । बड़े अल्मुनियम के पैन में रोटी बनती रहती । यह संभवतः बंबई ( मुंबई ) का सबसे सस्ता होटल था । यहाँ आने वाले ग्राहक अधिकतर कुली ओर भिखारी थे जो रास्ते में पेट भरने आते थे ।
 भोजनालय का मालिक स्वयं भी सारा दिन कड़ी मेहनत कर रोटियाँ बनाता रहता उस बड़े खुले चूल्हें में। जिसने, उसे जब चाय और रोटी खाने को दिया तो हरि बोला- मेरे पास पैसा नहीं हैं , यहाँ काम मिलेगा । मालिक ने उसे काम पर रख लिया- रसोई में दो लड़के पहले से हैं, एक और चलेगा । और बोले- तुम जूठे बर्तन धोना और उन लड़कों को रोटी के लिए आँटा गूंथने और रोटी बनाने में मदद करना । यहीं रह भी सकते हो । खाना के अलावे और लड़कों की तरह तुम्हें भी 140 रुपया रोज मिलेगा । 
अब हरि उस भोजनालय की रसोई का हिस्सा बन गया और काम में जुट गया । दोनों लड़के जो पहले से वहाँ थे चुपचाप काम करते जा रहे थे । जब उनमें से एक लड़का कुछ बोला तो हरि ने जाना कि वह तमिल भाषी है । तमिल भाषा , जिसे वह नहीं जानता था। वे लड़के न तो दोस्ताना दिखते थे न उसके बारे में कुछ जानने के इच्छुक । वे आग को जलाए रखने में जुटे रहते , साथ - साथ एक लड़का रोटियाँ बेलता तो दूसरा लड़का चिमटे की सहायता से आग पर रोटियाँ सेंकता । हरि को उन रोटियों को ग्राहकों तक पहुँचाने का काम मिला । उस जगह इतना ज्यादा काम था और गर्म भी इतना था उस कमरा में कि कभी किसी के पास बातें करने की शक्ति शेष न रहती । हरि भी चुप ही रहा ।
 वह चुप ही रहता यदि उसे सामने वाली घड़ी की दुकान का मालिक दोस्ताना रवैये वाला न लगता । उस दुकान का नाम था , टिक-टिक वॉच हाउस।
जब हरि वहाँ पास में जूठा खाना व कचरा आदि फेंकने आया तो उस दुकान और मालिक अली को देखा, जो हरि को देखकर मुस्कुराया । घड़ी के दुकान मालिक ने प्यार से उससे बातें की । शहर में नये आये हो ? हरि ने हाँ में जवाब दिया ।घड़ी मालिक ने पूछा।  हरि ने कहा- नहीं रामपुर गाँव से । मुझे एक बिल्डिंग का वॉचमैन यहाँ लेकर खाना खिलाने आया तो मैं यहाँ पर रह गया । और बच्चों को तो यहाँ जग्गू लेकर आया था । बूढे घड़ीसाज - मालिक ने लगातार अपनी घड़ी पर काम करते हुए हरि से बातें करना जारी रखा । उसका रवैया दोस्ताना देखकर हरी का उत्साह बढ़ता गया- हाँ यह आदमी मेरी कुछ मदद जरूर कर सकता है हरि सोचने लगा । बूढा घड़ीसाज आगे बोला- और भी लोग जग्गू के पास काम माँगने आते हैं । वे दो बच्चे जो तुम्हारे साथ काम कर रहे हैं उनके माता - पिता जब रेलवे ट्रैक पार कर पानी भरने जा रहे थे , तो ट्रेन से कटकर मर गये । उनका परिवार भी एक दूरगाँव से यहाँ शहर में काम के लिए आया था । माँ - बाप कट कर मर गये तो रेलवे प्लेटफॉर्म पर वह दो लड़के अनाथ हो अकेले रह गये । जग्गू उन्हें यहाँ काम पर लगा गया। हरि यह कहानी सुन काँप गया , उस भोजनालय के मालिक जग्गू के यहाँ वह अनाथ बच्चे की तरह पलने - बढ़ने , काम करते जाने के ख्याल से डर गया । फिर उसने उस बूढ़े घड़ी दुकान मालिक से कहा- काश मेरे पास पैसे होते तो एक पोस्टकार्ड खरीदता । हा - हा- बूढ़ा घड़ीसाज हँसा- अचानक तुम्हें किसी को चिट्ठी लिखना याद आ गया । जरूर लिखना चाहिए यदि कोई है तुम्हारा अपना कहीं दूर । सड़क के सीधे सामने एक बिजली घर है वहाँ जाओ, पर पैसे हैं पोस्टकार्ड खरीदने के लिए तुम्हारे पास ? कि दूँ तुम्हें पैसे ? हरि ने कृतज्ञतापूर्वक उस घड़ीसाज से पैसा लिया । वादा किया कि जैसे ही उसे जग्गू से पैसे मिलेंगे वह उसे लौटा देगी । उसने पोस्टकार्ड जाकर खरीद तो लिया पर कलम भी तो चाहिए थी, वह वापस घड़ीसाज के पास आया । उससे कलम माँग वहीं सड़क के पास पक्की फर्श पर बैठकर चिट्ठी लिखने लगा ।
 भोजनालय का मालिक जग्गू उस समय कहीं बाहर गया था । दोनों अनाथ लड़के सो रहे थे । उनके उठने के पहले यह चिट्ठी लिखने- छोड़ने का काम हो जाएगा और किसी को पता न चलेगा कि उसने क्या किया। यह सोचा हरि ने। फिर हरि ने अपनी माँ को चिट्ठी लिखी कि उसे बंबई में काम मिल गया है । चिन्ता न करें और वह बराबर घर को पैसे भेजता रहेगा । पोस्टकार्ड पर उसने अपने गाँव के घर का पता लिखा । प्रेषक के स्थान पर अपना नाम तो बड़े अक्षरों में लिखा , पर नये शहर का अपना पता नहीं लिखा, पोस्टकार्ड पोस्टबॉक्स में डालने के बाद उसे खुशी हुई कि यह काम करके तो पैसे भेजता रहेगा और उसे यह भी खुशी हुई कि यह काम तो कर दिया चुपचाप, लेकिन साथ ही उसे एक डर भी समा गया उसके मन में - उसके डर का कारण था कि अब वह गाँव वापस नहीं जा रहा था , यहीं बंबई में रहना था अब उसे । उसने उस पत्र में नम आंखों से, अपने अंदर की पीड़ा पर पत्थर रख लिखा -

प्यारी मां
            चरणस्पर्श प्रणाम, मुझे नौकरी मिल गई। मैं आपको नियमित रूप से पैसे भेजूंगा। मैं तो बम्बई में हूँ । मेरी लाडली बहनों को प्यार। मैंं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि पिता जी का सेहत जल्द हीं ठीक हो जाए। मुझे आशा है कि आप ठीक होंगे।

                                                   आपका बेटा
                                                        हरी

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दो शब्द मेरे प्रिय पाठकों के लिए-
इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में आपने अपना बहुमूल्य समय निकाल कर मेरे द्वारा लिखी इस कहानी को बहुत हीं रोमांचित हो कर पढ़ा इसके लिए आपको मेरा सप्रेम धन्यवाद🙏। यह कहानी आपको अच्छी लगी हो तो अपनो के साथ और अपने मित्रों के साथ जरूर साझा करें। अपना अनुभव तथा सुझाव व सलाह मेरे साथ जरूर साझा करें, मैं इसका बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं...
                         ~ kr Karan

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