Saturday, January 21, 2023

सफ़र सपने पाने की

                   सफ़र सपने पाने की

सपने देख हम, गांव से शहर को चले
ना कोई थी तजुर्बा, फिर भी हम शहर को झेले
मिलते थे बड़े आराम से, जो दो वक्त के रोटी
वो भी हमें अब, बड़े मुश्किल से बनाने को पड़े।

चैन गई, निंद उड़े, कहां गए अब वो यारों के संग
बस जिंदगी गुज़र रही है, बड़े मुश्किल से कठिनाइयों के संग
कि परिंदे भी नहीं रहते, पराये के आशियानों में
हम जिंदगी गुजार रहे हैं, किराए के मकानों में।

चूक होता जब भी, सलेक्शन पाने में
असमर्थ होता हूं तब, घरवालों को समझाने में
जो सपने देखें थे हमने, बेताब है मंजिल पाने को
सपने पूरे करने है घरवालों के, जो डूबे है कर्ज में हमें बनाने को।

Saturday, November 26, 2022

बोझ तले बचपन

                 😔 बोझ तले बचपन 😔

रंगो से भरा स्वप्न था, खुशियों से भरा बचपन
जो सर पर थे हाथ तुम्हारे, नाही थे कोई गम
पर विधि को थी ना मंजूर, जो हमारी मुस्कान
कांटो से हुई सामना हमारी, और सुना पड़ा बचपन।

तुम जो गए छोड़ हमें, अल्हड़ पड़ा बचपन
बिन तुम्हारे पापा हमें, खलते हैं त्योहारों के दिन
डूबा हुआ है अभी-भी, उन यादों में मेरा मन
जो जीचाहे अब करूं, होत अनुशासनहीन मेरा बचपन।

मां भी थोड़ी अब गुमसुम रहती, नाही कोई बात बताती
देख आंसू मैं घबराती, पर नाही कुछ समझ में आती
मैं भी कामों में हाथ बटाती, बड़े मुश्किल से घर चलाती
भर आती आंखे मेरी, और सुना पड़ा बचपन।

किससे व्यथा बताएं अपनी, किससे बांटू खुशियां
रह गए धरे स्वप्न हमारे, और सुना पड़ा बचपन...!

Sunday, August 21, 2022

🪖मैं एक सैनिक🪖


जगा रहूंगा दिन-रात
चाहे हो रेत की मैदान या हो बर्फ का पहाड़
चाहे आए तूफान या हो पूस की ठंडी रात
खड़ा रहूंगा सरहद पर सीना ताने
चाहे हो गोलियों की बौछार या हो बम की बरसात।

रूह न कांपेगा मेरा
लहू के कतरा-कतरा निछावर के समय
ये वतन की मिट्टी, जो इतनी सुगंधित है
कि मिल जाए मेरा लहू इस मिट्टी में
तो अफ़सोस न करूं देह निछावर के समय।

पहुंचा देना यह संदेश
इंतजार में बैठे, मेरे घरवालों को
ताकि गर्व से सीना तान सके
मेरे अंतिम संस्कार के समय।

--------------------- 🪖 जय हिन्द 🪖 ---------------------

Wednesday, June 15, 2022

😍खूबसूरत अंधेरा👁️😞

एक बार कि बात है,जब मैं बस से अपने घर से शहर की ओर जा रहा था, वही सफर के बीच में प्रकृति का मनोरम दृश्य से चाह के भी आंखे ओझल नहीं होती है। इसी को निहारते हुवे मैं अपने गंतव्य की और जा रहा था।
इसी बीच मेरी नज़र एकाएक एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी, जो दिखने में बहुत हीं खूबसूरत थी, उसमे से उसकी आंखे की खूबसूरती की बात हीं कुछ और थी, क्या आंखे थी..., शीशे जैसी चमचमाते बिलकुल पारियों सी। लेकिन क्या था, उसकी नज़रें एकदम सीधी सिर्फ आगे हीं देख रही थी। मुझे आश्चर्य हुवा की इतनी खूबसूरत प्रकृति की नजारे की ओर बाहर की ओर क्यों नहीं देख रही है, लग रहा था कि वह अपने बचपना वाले ख्यालों में खोई हुई है, शायद कुछ बातें होगी....या शायद मन नहीं होगा।
मैंने कुछ समय पश्चात फिर से देखा तो, मुझे फिर से आश्चर्य हुवा कि उसकी नज़रें सिर्फ आगे की ओर हीं थी।इस बार मुझसे रहा नही गया, मैंने बूढ़े लोगों के भांति उससे बहुत हीं विनर्मता से पेश आते हुए कहा-
प्यारी नन्ही सी परी... तुम बहुत हीं खूबसूरत हो.. और तुम्हारी आंखे परियों जैसे बहुत हीं ज्यादा खूबसूरत है, और तुम्हारी आंखों के काजल और भी अच्छे लग रहे है।
फिर क्या था, बहुत ही मीठी आवाज में जवाब आया-
"सर.., मुझे दिखाई नहीं देता है, मैं अंधी हूं...।"
ये सब बोलते वक्त उसकी जुबान लड़खड़ाई भी नहीं और ना हीं कोई संकोच व्यक्त की....।
पर, जैसे हीं उसकी मधुर आवाज मेरे कानों में दस्तक दी, मुझे बहुत हीं ज्यादा दुःख हुवा, मानो मेरा दिल कांप गया हो, और मेरे आंखो से आंसू निकल पड़े...।
फिर उसकी मां ने बताया कि वह कैसे अंधी हो गई थी।
उसकी मां बताती है कि बचपन का समय था जब उसकी बेटी छोटी थी, उसे पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ उसे अन्य कलाबाजी में भी बहुत हीं रुचि थी जैसे- कढ़ाई, सिलाई-बुनाई, पेपर व कपड़ो को काट काट कर खूबसूरत खिलौने व अन्य वस्तुएं बनाना और खेल खुद।
ऐसे हीं दिनभर कलाबाजी करती रहती, दिन खुशियों से बितते जा रहे थे।
एक दिन की बात थी वह दिन बिल्कुल हीं साफ़ और सुहाने थे, सूरज दोपहर में चमक रहा था मैंने देखा कि वह अपना कढ़ाई का काम छोड़कर, अपने बगल में सूई को रख दी थी। मैंने दूसरे के भांति उसे डांटा और बोली- 'अपना काम को आधे-अधूरे क्यों छोड़ दी....'
तो, उसने जवाब दिया- 
"मम्मा... दिन ढल गया है, सूरज डूब चुका है, रात हो चुकी है...अब शेष कार्य मैं कल दिन में करूंगी...."
लेकिन जब ये सब बोल रही थी उस समय दोपहर में सूरज ठीक ऊपर चमक रहा था....शायद उसकी आंखो में सूरज के किरण प्रवेश नहीं कर पा रहे थे।
उसके मां से ये सब सुनकर मैं निशब्द हो गया और मेरे दिल के पीड़ा और भी बढ़ गया और मैंने अपने यात्रा के दौरान सिर्फ और सिर्फ उसी बच्ची के बारे में सोचता रहा.., सोचता रहा..., सोचता रहा.....!

Saturday, March 12, 2022

मेरी जिम्मेवारियां हीं, मुझे खुद दफ्न करते जा रही है..

यह कहानी उन लाखों लड़कों में से किसी एक की दास्तां है जो अपनी परिवार की जिम्मेवारियां सर पर उठाए बड़े शहरों में अपना परिवार की जरूरतों तथा अपनी सपनों को पूरा करने के लिए न जाने उन्हें कितने तकलीफे, पीड़ा और ठोकरें खाने को मिलते है, फिर भी वे अपनी जिम्मेवारियों से पीछे नही हटते....
 हरी नाम का एक लड़का(जिसके पिताजी पिछले गत कुछ सालों से गंभीर बीमारी से ग्रसित थे, यूं माने तो घर के एक कोने में सिर्फ एक लाश की तरह पड़े रहते थे) बड़े शहर बम्बई(मुंबई) जाता है, जाने के क्रम में उसने अपने जीवन में पहली बार रेलवे स्टेशन और लंबी-लंबी बोगियों वाली ट्रेन देखा, जहां लोग रात में लाशों की तरह जमीन पर पड़े कोई फटे कंबल में, तो कोई फटे शॉल में अपनी रातें बीता रहे थे और ट्रेन आने का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, इतना हीं में उसका बम्बई जाने वाला ट्रेन आती है जो पहले से हीं खचाखच भरी थी,उसने जैसे-तैसे, आनन-फानन में अपने लोगों के साथ ट्रेन में तो आ जाता है, लेकिन उसका पुरानी चप्पल जो घिस चुका था, लेकिन अभी भी चलता, गेट पर चढ़ने के दौरान भिड़ के अफरा-तफ़री के कारण एक चप्पल टूट कर वहीं रह गया, खैर उसे बम्बई जाना था तो उसने इसका परवाह नही किया, वैसे भी वह कर क्या सकता था सिवाय पछताने के। रास्ते में मां के हाथों से बने सूखे रोटियां और आचार तथा फूले चने खाकर बड़े हीं मुस्किल से रात-दिन बीता कर सपनों की दुनियां बम्बई पहुंच तो गया, पर वहां के जिंदगी देख दंग रह गया।
खैर... वहां उसे काम की तलाश में एक होटल के पास ले जाया जाता है जहां, गरीब भोजनालय जैसा घटिया होटल हरि ने कहीं नहीं देखा था । यहाँ तक कि उसके गाँव रामपुर में जो चाय के छोटे- मोटे होटल थे, वे भी उससे कई गुना अच्छी हालात में थे । लेकिन इसकी क्या बात करें । यहाँ की दीवाल पर तो एक ढंग की रंगीन तस्वीर भी नहीं लगी थी । हो सकता है कभी दीवार पर यहाँ कोई फोटो कभी लगी हो जो दीवार पर  जमी मैल और कालिख के नीचे गुम हो गयी हो । यहां तक कि कमरे या हॉल के छत की सीलिंग ( अंदरुनी छत ) पर मकड़े के जाले भरे पड़े थे , जिनमें कालिख और मैल जम गयी थी जो कभी भी किसी ग्राहक के सिर पर काली टोपी की तरह गिर पड़ती थी । प्लास्टिक और लकड़ी के टेबल भी काली मैल के चकत्तों से भरे पड़े थे। सारी रात और सारा दिन वहाँ चूल्हा जलता रहता । बड़े अल्मुनियम के पैन में रोटी बनती रहती । यह संभवतः बंबई ( मुंबई ) का सबसे सस्ता होटल था । यहाँ आने वाले ग्राहक अधिकतर कुली ओर भिखारी थे जो रास्ते में पेट भरने आते थे ।
 भोजनालय का मालिक स्वयं भी सारा दिन कड़ी मेहनत कर रोटियाँ बनाता रहता उस बड़े खुले चूल्हें में। जिसने, उसे जब चाय और रोटी खाने को दिया तो हरि बोला- मेरे पास पैसा नहीं हैं , यहाँ काम मिलेगा । मालिक ने उसे काम पर रख लिया- रसोई में दो लड़के पहले से हैं, एक और चलेगा । और बोले- तुम जूठे बर्तन धोना और उन लड़कों को रोटी के लिए आँटा गूंथने और रोटी बनाने में मदद करना । यहीं रह भी सकते हो । खाना के अलावे और लड़कों की तरह तुम्हें भी 140 रुपया रोज मिलेगा । 
अब हरि उस भोजनालय की रसोई का हिस्सा बन गया और काम में जुट गया । दोनों लड़के जो पहले से वहाँ थे चुपचाप काम करते जा रहे थे । जब उनमें से एक लड़का कुछ बोला तो हरि ने जाना कि वह तमिल भाषी है । तमिल भाषा , जिसे वह नहीं जानता था। वे लड़के न तो दोस्ताना दिखते थे न उसके बारे में कुछ जानने के इच्छुक । वे आग को जलाए रखने में जुटे रहते , साथ - साथ एक लड़का रोटियाँ बेलता तो दूसरा लड़का चिमटे की सहायता से आग पर रोटियाँ सेंकता । हरि को उन रोटियों को ग्राहकों तक पहुँचाने का काम मिला । उस जगह इतना ज्यादा काम था और गर्म भी इतना था उस कमरा में कि कभी किसी के पास बातें करने की शक्ति शेष न रहती । हरि भी चुप ही रहा ।
 वह चुप ही रहता यदि उसे सामने वाली घड़ी की दुकान का मालिक दोस्ताना रवैये वाला न लगता । उस दुकान का नाम था , टिक-टिक वॉच हाउस।
जब हरि वहाँ पास में जूठा खाना व कचरा आदि फेंकने आया तो उस दुकान और मालिक अली को देखा, जो हरि को देखकर मुस्कुराया । घड़ी के दुकान मालिक ने प्यार से उससे बातें की । शहर में नये आये हो ? हरि ने हाँ में जवाब दिया ।घड़ी मालिक ने पूछा।  हरि ने कहा- नहीं रामपुर गाँव से । मुझे एक बिल्डिंग का वॉचमैन यहाँ लेकर खाना खिलाने आया तो मैं यहाँ पर रह गया । और बच्चों को तो यहाँ जग्गू लेकर आया था । बूढे घड़ीसाज - मालिक ने लगातार अपनी घड़ी पर काम करते हुए हरि से बातें करना जारी रखा । उसका रवैया दोस्ताना देखकर हरी का उत्साह बढ़ता गया- हाँ यह आदमी मेरी कुछ मदद जरूर कर सकता है हरि सोचने लगा । बूढा घड़ीसाज आगे बोला- और भी लोग जग्गू के पास काम माँगने आते हैं । वे दो बच्चे जो तुम्हारे साथ काम कर रहे हैं उनके माता - पिता जब रेलवे ट्रैक पार कर पानी भरने जा रहे थे , तो ट्रेन से कटकर मर गये । उनका परिवार भी एक दूरगाँव से यहाँ शहर में काम के लिए आया था । माँ - बाप कट कर मर गये तो रेलवे प्लेटफॉर्म पर वह दो लड़के अनाथ हो अकेले रह गये । जग्गू उन्हें यहाँ काम पर लगा गया। हरि यह कहानी सुन काँप गया , उस भोजनालय के मालिक जग्गू के यहाँ वह अनाथ बच्चे की तरह पलने - बढ़ने , काम करते जाने के ख्याल से डर गया । फिर उसने उस बूढ़े घड़ी दुकान मालिक से कहा- काश मेरे पास पैसे होते तो एक पोस्टकार्ड खरीदता । हा - हा- बूढ़ा घड़ीसाज हँसा- अचानक तुम्हें किसी को चिट्ठी लिखना याद आ गया । जरूर लिखना चाहिए यदि कोई है तुम्हारा अपना कहीं दूर । सड़क के सीधे सामने एक बिजली घर है वहाँ जाओ, पर पैसे हैं पोस्टकार्ड खरीदने के लिए तुम्हारे पास ? कि दूँ तुम्हें पैसे ? हरि ने कृतज्ञतापूर्वक उस घड़ीसाज से पैसा लिया । वादा किया कि जैसे ही उसे जग्गू से पैसे मिलेंगे वह उसे लौटा देगी । उसने पोस्टकार्ड जाकर खरीद तो लिया पर कलम भी तो चाहिए थी, वह वापस घड़ीसाज के पास आया । उससे कलम माँग वहीं सड़क के पास पक्की फर्श पर बैठकर चिट्ठी लिखने लगा ।
 भोजनालय का मालिक जग्गू उस समय कहीं बाहर गया था । दोनों अनाथ लड़के सो रहे थे । उनके उठने के पहले यह चिट्ठी लिखने- छोड़ने का काम हो जाएगा और किसी को पता न चलेगा कि उसने क्या किया। यह सोचा हरि ने। फिर हरि ने अपनी माँ को चिट्ठी लिखी कि उसे बंबई में काम मिल गया है । चिन्ता न करें और वह बराबर घर को पैसे भेजता रहेगा । पोस्टकार्ड पर उसने अपने गाँव के घर का पता लिखा । प्रेषक के स्थान पर अपना नाम तो बड़े अक्षरों में लिखा , पर नये शहर का अपना पता नहीं लिखा, पोस्टकार्ड पोस्टबॉक्स में डालने के बाद उसे खुशी हुई कि यह काम करके तो पैसे भेजता रहेगा और उसे यह भी खुशी हुई कि यह काम तो कर दिया चुपचाप, लेकिन साथ ही उसे एक डर भी समा गया उसके मन में - उसके डर का कारण था कि अब वह गाँव वापस नहीं जा रहा था , यहीं बंबई में रहना था अब उसे । उसने उस पत्र में नम आंखों से, अपने अंदर की पीड़ा पर पत्थर रख लिखा -

प्यारी मां, 
            चरणस्पर्श प्रणाम, मुझे नौकरी मिल गई। मैं आपको नियमित रूप से पैसे भेजूंगा। मैं तो बम्बई में हूँ । मेरी लाडली बहनों को प्यार। मैंं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि पिता जी का सेहत जल्द हीं ठीक हो जाए। मुझे आशा है कि आप ठीक होंगे।

                                                   आपका बेटा
                                                        हरी

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दो शब्द मेरे प्रिय पाठकों के लिए-
इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में आपने अपना बहुमूल्य समय निकाल कर मेरे द्वारा लिखी इस कहानी को बहुत हीं रोमांचित हो कर पढ़ा इसके लिए आपको मेरा सप्रेम धन्यवाद🙏। यह कहानी आपको अच्छी लगी हो तो अपनो के साथ और अपने मित्रों के साथ जरूर साझा करें। अपना अनुभव तथा सुझाव व सलाह मेरे साथ जरूर साझा करें, मैं इसका बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं...
                         ~ kr Karan

Saturday, December 25, 2021

मोमबत्ती के लिए..

आज क्रिसमस का दिन था मैं इस बार देर से चर्च के लिए निकला लगभग रात के  8 बज चुके थे, मैं भी चर्च पहुंच कर सबों की तरह कर मोमबत्ती जलाया और यीशु से ढेर सारी मनोकामनाएं मांगा और बस वहां से निकलने हीं वाला था कि वहां पर तीन-चार बच्चे और और एक महिला थी जो बिलकुल ही फटे पुराने कपड़े पहने हुवे थे बस यू हीं बच्चे बुझे मोमबत्ती को वहां से लेने लगे शायद उनके घर में रोशनी की कमी थी....हम सभी ये देख कर दंग रह गए कुछ ने तो आवाज लगाई कि क्या कर रहे हो जाओ यहां से लेकिन ये उनकी मजबूरियां थी या कुछ और कहा भी नहीं जा सकता.... मैं बस वहां से निकलने ही वाला था लेकिन उनकी ये दशा नहीं देखी जा रही थी मेरे ख्यालों में उनकी मजबूरियां की छवि हीं चल रही थी मैंने उस महिला के पास जा कर उनसे बात करने की कोशिश की पर वे सिर्फ खाना की बात हीं कर रहे थे शायद लोगो से कुछ उम्मीद लगाए यहां आए थे तो मैंने अपने पैकेट में हाथ डाला पर कुछ ही पैसे थे शायद 40-50 रुपए लेकिन इतना से क्या होता फिर भी सोचने से क्या लाभ... मैंने दे दिए शायद कुछ मदद मिल जाए और वहां से निकलने से पहले यीशु से एक आखरी प्रार्थना की कि हे ईश्वर इनकी बस आप ही मदद कर सकते है इनकी इतना मदद कर देना ताकि इनको जीने के लिए दो वक्त का अन्न मिल सके ....बस निकलने ही वाला था कि वहीं रास्ते में वही बच्चे फिर मिले, मैंने उनसे बात करने की कोशिश कि उनके घर के बारे में लेकिन वे सिर्फ कुछ खाने के लिए कुछ पैसे मांग रहे थे छोड़ने को तैयार ही नहीं पर मेरे पास तो अब कुछ भी नही बचा,उनको जब मैंने बोला कि मैंने आपके मम्मी को कुछ पैसे दे दिए है जाके कुछ खा लेना तो तुरंत जवाब मिला कि वो मेरी मौसी है शायद उनकी मम्मी साथ नहीं आई थी या उनकी मां इस दुनिया में थी ही नहीं लेकिन मैं मन हीं मन सोच ही रहा था कि इतना चंद हीं रूपयो से क्या होने वाला है.... इतना कहते बाहर तक भी साथ ही आए शायद कुछ मिल जाए पर मैं कुछ भी नही दे सका इतने में हीं उनकी मोसी यान पड़ी और डाटने लगी और बोल रही थी कि चलो घर.... , मैंने कुछ दूर तक उनका पीछा किया तो मैं उन बच्चो के हाथों में एक बासुंरी और मोमबत्तियां थी, उनमें एक को जलाए हुए और बांसुरी बजाते अंधेरे सड़को पर जा रहे थे और बची हुई मोमबत्तियां जो शायद उनकी छोटी-सी हथेलियों में अट नही पा रहा था फिर भी दबोचे मानो ऐसा लग रहा था कि उनको घर के लिए रोशनी मिल गई हो और चलते गए चलते गए..., पर उनकी ये हुशमुख चेहरा साथ बांसुरी की बेधुन सुर मानो मन मोह रहा था,मुझे भी वापस घर को लौटना था काफ़ी रात होने को चली थी और ठंड भी काफ़ी थी तो मैंने उनकी चेहरे की खुशी की यादों को समेटे अपने गंतव्य की ओर चल पड़ा।
Marry charismas to all ,and wish from God that everyone lives happily and prosperous life.
                  Written by:- kr Karan
                        (25/12/2021)

अतीत का फैशन

                    अतीत का फैशन अस्सी का दशक आज बड़ा खूबसूरत लग रहा है हमने कहाँ उनकी तंगी देखी, सिर्फ़ दीवारों पर लटकी उनकी तस्वीरें देखी ...