Saturday, January 21, 2023

सफ़र सपने पाने की

                   सफ़र सपने पाने की

सपने देख हम, गांव से शहर को चले
ना कोई थी तजुर्बा, फिर भी हम शहर को झेले
मिलते थे बड़े आराम से, जो दो वक्त के रोटी
वो भी हमें अब, बड़े मुश्किल से बनाने को पड़े।

चैन गई, निंद उड़े, कहां गए अब वो यारों के संग
बस जिंदगी गुज़र रही है, बड़े मुश्किल से कठिनाइयों के संग
कि परिंदे भी नहीं रहते, पराये के आशियानों में
हम जिंदगी गुजार रहे हैं, किराए के मकानों में।

चूक होता जब भी, सलेक्शन पाने में
असमर्थ होता हूं तब, घरवालों को समझाने में
जो सपने देखें थे हमने, बेताब है मंजिल पाने को
सपने पूरे करने है घरवालों के, जो डूबे है कर्ज में हमें बनाने को।

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